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शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

परिचय ---शशि पाधा





पर्वत पुत्री जम्मू नगरी
बनी थी मेरी जन्म स्थली
नदियां-झरने सखि सहेली
माँ बाबा की गोद मिली 

घर में पूजा आरती वंदन
ठाकुर द्वारे खुशबू चन्दन
पुस्तक ही थी खेल खिलोने 
माँ सरस्वती का अभिनन्दन

गीत संगीत की गुंजन रहती
काव्य की गँगा हर पल बहती
रचना का संस्कार वहीं से
छंदों में मैं सब कुछ कहती

वीर सेनानी के संग ब्याही
शौर्य को आँखों से  देखा था
बलिदानों की अमर कहानी
साहस की असीमित रेखा

प्रकृति ने संग कभी न छोड़ा
मन भी उसके संग ही दौड़ा
राग विराग, हर्ष विषाद
सबको ही मन के संग जोड़ा

लिखा है कुछ, कुछ लिखना बाकी
कागज पे रँग भरना बाकी
मन के भावों अनुभावों को
शब्दरूप अब करना बाकी |
  
मन की भाषा लिख न पाई
शब्दों ने इक राह सुझाई
 अंतर्मन में झाँक के देखा
कविता कितने रूप में आई


जम्मू  में जन्मी शशि पाधा का बचपन साहित्य एवं संगीत के मिले जुले वातावरण में व्यतीत हुआ | उनका  घर   माँ के भक्ति गीतों, पिता के संस्कृत श्लोक तथा भाई के लोक गीतों के पावन एवं मधुर सुरों से सदैव  गुंजित रहता | पढ़ने के लिए हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकारों की पुस्तकें तथा पत्र- पत्रिकाएँ सहज उपलब्ध थीं | शायद यही कारण था कि शशि जी बाल्यकाल से ही बालगीत/ लघुकथाएँ रचने लगीं | 
इन्होंने जम्मू - कश्मीर विश्वविद्यालय से एम.ए हिन्दी ,एम.ए संस्कॄत तथा
बी . एड की शिक्षा ग्रहण की । वर्ष १९६७ में यह सितार वादन प्रतियोगिता में राज्य के प्रथम पुरुस्कार से सम्मानित हुईं । वर्ष १९६८ में इन्हें जम्मू विश्वविद्यालय से "ऑल राउंड बेस्ट वीमेन ग्रेजुयेट " के पुरुस्कार से सम्मनित किया गया ।

इन्होंने आकाश्वाणी जम्मू के नाटकपरिचर्चावाद विवाद काव्य पाठ आदि
विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया तथा लगभग १६ वर्ष तक भारत में हिन्दी
तथा संस्कृत भाषा का अध्यापन कार्य किया । सैनिक की पत्नी होने के नाते
इन्होंने सैनिकों के शौर्य  एवं बलिदान से अभिभूत हो  अनेक रचनाएं  लिखीं । अपने कालेज के दिनों में शशि ने वाद विवाद प्रतियोगितायों में तथा अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया | वे कालेज की साहित्यिक पत्रिका द्विगर्तकी संपादिका भी रहीं | भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने  इनकी सैनिकों के विषय में लिखी रचनायों को पढ़ने के बाद उनको सराहना पूर्ण पत्र  लिखा जिसे यह अपने जीवन की उपलब्धि मानती हैं | अमेरिका में इन्होने कई काव्य गोष्ठियों में कविता पाठ किया |

इनके लेखकहानियां एवं काव्य रचनायें " पंजाब केसरी "   दैनिक जागरण  एवं देश विदेश की विभिन्न पत्र -पत्रिकायों में छ्पती रहीं। इनके गीतों को अनूप जलोटा, शाम साजन , प्रकाश शर्मा तथा अन्य गायकों ने स्वर बद्ध करके गाया ।

वर्ष २००२ में यह यू.एस आईं । यहां नार्थ केरोलिना के चैपल हिल विश्व्वविद्यालय में हिन्दी भाषा का अध्यापन कार्य किया ।  शशि जी की रचनाएं विभिन्न  पत्रिकायों में प्रकाशित हुई हैं जिनमें से प्रमुख हैं हिंदी चेतनाहिंदी जगतअनुभूति  अभिव्यक्ति , साहित्यकुंज , गर्भनाल , साहित्यशिल्पी, सृजनगाथा ,कविताकोश, आखरकलश तथा   पाखी |
शशि जी के तीन कविता संग्रह पहली किरण मानस मंथन तथा अनंत की ओर  प्राकाशित हो चुके हैं | कविता के साथ साथ वे  आलेख ,संस्मरण तथा लघुकथाएं भी लिखतीं हैं |

संप्रति वे  अपने परिवार के साथ अमेरिका के  मेरीलैंड राज्य में रहतीं हुईं साहित्य सेवा में संलग्न हैं |

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

परिचय - अरुण चन्द्र रॉय



  • जन्म तिथि: ३०.०९. १९७४
  • जन्म स्थान : ग्राम रामपुर, जिला : मधुबनी , बिहार
  • मधुबनी जिले के एक छोटे से गाँव रामपुर में जन्म हुआ । प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक विद्यालय में हुई । बाद में धनबाद (अब झारखण्ड में) में रहना हुआ । डी0 ए0 वी0 स्कूल से १०+२ ।
  • धनबाद के पी0 के0 राय स्मृति कालेज से ग्रैजुएशन 
  • विनोबा भावे विश्विद्यालय हज़ारीबाग से अँग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर स्वर्ण मेडल लेकर पास किया ।
  • ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग से एम0 बी0 ए0 (फाइनांस) स्वर्ण मेडल के साथ उत्तीर्ण किया ।
  • दिल्ली के भारती विद्याभवन से जनसंचार एवं पत्रकारिता में पोस्ट ग्रैज़ुएट डिप्लोमा पास किया । कालेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया .
  • पोंडिचेरी विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम ए . 
  • स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का नियमित प्रकाशन एवं स्थानीय कवि सम्मेलनों में भाग लेते रहे ।
  • कई महत्त्वपूर्ण लघु पत्रिकों जैसे हंस, कादम्बिनी, कतार, स्वाति, और समाचार पत्र जैसे आवाज़, जनमत, प्रभात खबर, दैनिक प्रभात, दैनिक जागरण आदि में कविता, आलेख का प्रकाशन.
  • रेडियो के लिए विभिन्न प्रायोजित कार्यक्रमों जैसे पोषण और स्वास्थय, आँखे हैं अनमोल के सौ से अधिक एपिसोडों का लेखन
  • भीष्म साहिनी का नाटक "कविरा खड़ा बाज़ार में " का रेडियो रूपांतरण. 
  • लगभग बीस विज्ञापन फिल्मो का स्क्रिप्ट लेखन और निर्देशन.
  • सैकड़ो प्रिंट विज्ञापन का लेखन और मुद्रण 
  • देश के सभी बड़े ब्रांडों जैसे टी वी एस, एयरटेल, आई सी आई सी आई, पल्स पोलियो अभियान, एस बी आई, बी एस एन एल, एम टी एन एल,  गेल इण्डिया, ड़ी एल ऍफ़, के लिए विज्ञापन लेखन
  • बी एस एन एल का brand logo का निर्माण, एम टी एन एल के कई टेलीफोन उत्पादों का ब्रांड नामाकरण जैसे एम टी एन एल डालफिन, एम टी एन एल ट्रंप
  • दिल्ली एडवरटाईजिंग  कल्ब से बेस्ट कापी राइटर का तीन बार पुरस्कार - २०००, २००१ और २००३ 
  • बाबा बटेसरनाथ उपन्यास को आधार बना कर लिखी एक कविता को जब स्वयं बाबा नागार्जुन ने पढ़ा तो उन्होंने कुछ इस तरह टिप्पणी की "अरुण तुम्हारी यह कविता मुझे उद्वेलित कर रही है. कभी सुविधानुसार तुम मेरे साथ एक सप्ताह रहो।"
  •  पुस्तकें प्रकाशित : बच्चो के लिए अंग्रेजी कविता की पुस्तक 'रन फन एन्जॉय' , प्रबंधन पर एक पुस्तक "मैनेजमेंट एंड लीडरशिप थाट्स", रियल एस्टेट पर शोधात्मक पुस्तक - "रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट सिनारियो इन इण्डिया"
  • प्रकाशनाधीन पुस्तकें : कविता संग्रह "प्रश्न काल", समसामयिक विषय पर पुस्तक  "विश्व के बड़े नाभकीय हादसे", "भारत में भूख", "प्लास्टिक की रंगीन दुनिया और पर्यावरण" , हिंदी कहानी संग्रह "नो मैन्स लैंड"
  • भारत सरकार में वरिष्ठ अनुवादक ।

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

परिचय - अनुलता राज नायर


मैं हूँ अनु..अनुलता राज नायर.44 वर्षीय गृहणी और दो बेटों की माँ हूँ.
केमेस्ट्री में एम.एस.सी किया है.पढ़ना बहुत पसंद है.विद्यार्थी जीवन में पढाकू किस्म की थी सो तब कविता सूझती न थी....
फिर कुछ यूँ हुआ कि ज़िन्दगी ज़रा ठहरी और वक्त मिला भावनाओं को शब्दों में अभिव्यक्त करने का.. !!
कभी सुकून मिला तो दिल गुनगुनाया..या कभी दर्द हुआ तो मन कसमसाया...और जो दिल में आया उसको ढाल दिया शब्दों में....अनजाने ही बन गयी कविता..
अब कुछ सालों से  लेखन कर रही हूँ .डेढ़ साल पहले जबसे ब्लॉग लिखने लगी तब से पाठकों और माननीय रचनाकारों  के प्रोत्साहन और माता पिता के आशीर्वाद से नियमित लेखन जारी है.अब तक तकरीबन १५० से ज्यादा कवितायें और दो कहानियाँ  लिख चुकी हूँ.
सबसे  पहले १९९५ में मनोरमा में एक संस्मरण छापा था.
दैनिक भास्कर की मधुरिमा में भी कविता प्रकाशित.
छत्तीसगढ़ से प्रकाशित समाचार पत्र "भास्कर भूमि " में नियमित रचनाएँ प्रकाशित.
प्रतिष्ठित पत्रिका अहा ! जिंदगी में मेरा एक पत्र प्रकाशित.
कविता संग्रह-
"ह्रदय तारों का स्पंदन " प्रकाशित -जिसमे ५ प्रेम कवितायें हमारी हैं.
"खामोश खामोश और हम " में मेरी रचनाएँ.
रश्मि प्रभा जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "शब्दों के अरण्य" में मेरी एक रचना.

मेरा ब्लॉग   my dreams 'n' expression याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन 
http://allexpression.blogspot.in/

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

परिचय - शशि पुरवार



 शशि पुरवार 
जन्म तिथि    ----     २२ जून १९७३ 
जन्म  स्थान   ---     इंदौर ( म. प्र.)
शिक्षा ----   स्नातक उपाधि ---- ,बी. एस  सी ( विज्ञानं )
              
स्नातकोत्तर उपाधि -    एम . ए ( राजनीती शास्त्र )
                   (देविअहिल्या विश्विधालय  ,इंदौर )
     हानर्स  डिप्लोमा इन कंप्यूटर  साफ्टवेयर ( तीन साल का )

कार्य अनुभव    ---    मेडिकल  रिप्रेजेंटेटिव के रूप में सफलता पुर्वक कार्य किया. 
         रचनात्मकता और कार्यशीलता ही पहचान है 
भाषा ज्ञान    ----  हिंदी  ,अंग्रेजी , मराठी .

पारिवारिक परिचय --- 
          माता   --    श्रीमती मंजुला गुप्ता (  एम ए , बीएड  . हिंदी )
          पिता   ---   श्री महेश गुप्ता (  बी एस सी , बी कॉम , एम कॉम ( वाणिज्य ) )

         प्रकाशन  ------ कई समाचार पत्रों और पत्रिकाओ में रचनाओ ,लेख , कविता का  का प्रकाशन .लोकमत समाचार , नारी जाग्रति पत्रिका , सरिता  एवं कईरास्ट्रीय पत्रिका में  प्रकाशन  होता रहता है .
         अंतर्जाल पर कई पत्रिकाओ में रचनाओ  प्रकाशन होता रहता है 
 .

लेखन  विधाए व  पहचान --------    कहानी , कविता , काव्य की अलग अलग विधाए  और लेखों के माध्यम से जीवन के बिभिन्न रंगों को उकेरना पसंद है .
जीवन के हर रंगों का अनुभव लेना और  शब्दों में ढालना पसंद है . नयी विधाओ को सिखने का प्रयास और जीवन भर विद्यार्थी रहना ही पसंद है .कविता दिल व आत्मा से निकली हुई आवाज होती है ,एवं शशि का अर्थ  है चाँद तो चाँद की तरह शीतलता बिखेरने का नाम है जिंदगी .
 मुंबई में मंच पर रचना का पाठ भी सफलता पूर्वक किया .और विविध गुण दर्शन  की प्रतियोगिता में पुरस्कृत ,क्रियाशीलता ही मेरी पहचान है 
.

संपर्क ----     मो -- 09420519803
email -  shashipurwar@gmail.com

शनिवार, 29 सितंबर 2012

परिचय - महेश्वरी कनेरी





 
   मैं कौन हूँ…? कहाँ से आई हूँ…?
ये सभी अनबुझ प्रश्न हमारे मानस पटल पर अकसर आ-आकर दस्तक देजाते हैं..और हम. शुन्य में ताकते रह जाते हैं,
कभी सोचती  
 ईश्वर की बनाई गई अनुपम कृतियों में से एक हूँ मैं
कभी सोचती
माता-पिता की उम्मीद और विश्वास की एक कण हूँ मैं
जो भी सोचती हूँ बस खुद को तसल्ली  सी दे्ती हूँ
बस इतना ही कह सकती हूँ
खुद को खुद में तलाशती
एक बहती जल धार हूँ मैं
बहना अगर नियति है तो
बहती  ही जाऊँगी ..
मन में उठते भावो को न रोक सकी थी कभी
न अब रोक पाऊँगी
रुकना नही मुझे
 चलना है बस चलते ही जाना है …….
 
नाम-                महेश्वरी कनेरी
जन्म तिथि -.                  २६ नवम्बर १९४७
जन्म स्थान           देहरादून-उत्तराखण्ड़
शिक्षा                 स्नातक
भाषाज्ञान              हिन्दी अग्रे़जी
माता                 स्वर्गीय श्रीमती रुकमणी देवी
पिता-                 स्वर्गीय श्री कुशाल सिंह रजवार
विशेष रुचि-             लिखने पढ़ने के अतिरिक्त संगीत एवं चित्र कला
व्यवसाय-               केन्द्रीय विधालय मे शिक्षिका और मुख्याधिपिका के रुप में रह चुकी,अब सेवा
                    निवृत हूँ
प्रकाशित काव्य संग्रह -   आओ मिल कर गाएं गीत अनेक (बच्चों के लिए)
साझा काव्य संग्रह  -    “टुटते सितारो की उड़ान” “प्रतिभाओं की कमी नहीं”..
अन्य कृतियाँ (कैसेट)     ओडियो कैसेट “गीत नाटिका” संग्रह बच्चों के लिए,  “मूर्तिकार”
 सम्मान-             १- प्रोत्साहन पुरस्कार द्वारा, केन्द्रीय विधालय संगठन १९९४,
                    २- राष्ट्र्पति पुरस्कार,२०००
मेरा ब्लांग-           मुख्य ब्लांग “अभिव्यंजना “
                    निर्माणाधीन ब्लांग- बच्चों के लिए “बाल मन की राहें “
ई-मेल-              maheshwari.kaneri@gmail.com
ब्लांग पता          http://kaneriabhivainjana.blogspot.in

बुधवार, 26 सितंबर 2012

परिचय - वंदना गुप्ता





 
अपरिचित हूँ मैं ..........

ना जाने कैसे कह देते हैं
हाँ , जानते हैं हम 
खुद  को या फ़लाने को
मगर किसे जानते हैं
ये भेद ना जान पाते हैं
कौन है वो ?
शरीर का लबादा ओढ़े 
आत्मा या ये शरीर
ये रूप
ये चेहरा -मोहरा
कौन है वो
जिसे हम जानते हैं
जो एक पहचान  बनता है
क्या शरीर ?
यदि शरीर पहचान है तो
फिर आत्मा की क्या जरूरत
मगर शरीर निष्क्रिय है तब तक
जब तक ना आत्मा का संचार हो
एक चेतन रूप ना विराजमान हो
तो शरीर तो ना पहचान हुआ 
तो क्या हम
आत्मा को जानते हैं
वो होती है पहचान 
ये प्रश्न खड़ा हो जाता है
अर्थात शरीर का तो 
अस्तित्व ही मिट जाता है
मगर सुना है
आत्मा का तो 
ना कोई स्वरुप होता है
आत्मा नित्य है
शाश्वत है
उसका ना कोई रूप है
ना रंग
फिर क्या है वो
एक हवा का झोंका 
जो होकर भी नहीं होता
फिर कैसे कह दें
हाँ जानते हैं हम
खुद को या फ़लाने को
क्योंकि ना वो आत्मा है
ना वो शरीर है
फिर क्या है शाश्वत सत्य
और क्या है अनश्वर
दृष्टिदोष तो नहीं
कैसे पृथक करें 
और किसे स्थापित करें
द्वन्द खड़ा हो जाता है
शरीर और आत्मा का 
भेद ना मिटा पाता है
कोई पहचान ना मिल पाती है
ना शरीर को
ना आत्मा को
दोनों ही आभासी हो जाते हैं
शरीर नश्वर 
आत्मा अनश्वर 
फिर कैसे पहचान बने
विपरीत ध्रुवों का एकीकरण 
संभव ना हो पाता है 
फिर कैसे कोई कह सकता है
फलाना राम है या सीता
फलाना मोहन है या गीता
ये नाम की गंगोत्री में उलझा 
पहचान ना बन पाता है
ना शरीर है अपना ना आत्मा
दोनों हैं सिर्फ आभासी विभूतियाँ
मगर सत्य तो एक ही
कायम रहता है
सिर्फ पहचान देने को
एक नाम भर बन जाने को
आत्मा ने शरीर का
आवरण ओढा होता है
पर वास्तविकता तो 
हमेशा यही रहती है
कोई ना किसी को जान पाता है
खुद को भी ना पहचान पाता है
फिर दूसरे को हम जानते हैं
स्वयं को पहचानते हैं 
ये प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है
ये तो मात्र दृष्टिभ्रम लगता है
जब तक ना स्वयं का बोध होता है 
तो बताओ ,
कैसे परिचय दूं अपना
कौन हूँ
क्या हूँ
ज्ञात नहीं
अज्ञात को जाने की 
प्रक्रिया में हूँ तत्पर
परिचय की ड्योढ़ी पर
दरवाज़ा खटखटाते हुए
अपरिचित हूँ मैं ..........


नाम: वन्दना गुप्ता
फोन : 9868077896
मेल: rosered8flower@gmail.com
ब्लोगिंग की शुरुआत जून 2007 
प्रकाशित साझा काव्य संग्रह : 1)“टूटते सितारों की उडान “
                                          2)“स्त्री होकर सवाल करती है “
                                 3)"ह्रदय तारों का स्पंदन"            
                              4) शब्दों के अरण्य मे 
                                     5) प्रतिभाओं की कमी नहीं
                  6) कस्तूरी                    
           प्रकाशित साझा पुस्तकें : 1) हिन्दी ब्लोगिंग : अभिव्यक्ति की नई क्रांति
                                                                              2)हिन्दीन ब्लॉ्गिंग : स्वपरुप, व्याहप्ति और संभावनाएं 

                             पत्रिकाओं मे प्रकाशित रचनायें : ब्लोग इन मीडिया, गजरौला टाइम्स ,उदंती छत्तीसगढ़ रायपुर ,                                                        
                                                                                 स्वाभिमान टाइम्स, हमारा मेट्रो, सप्तरंगी प्रेम. हिंदी साहित्य शिल्पी, 
                                                                                वटवृक्ष मधेपुरा टाइम्स, नव्या ,नयी गज़ल ,OBO पत्रिका, प्रेम. हिंदी 
                                                                              साहित्य शिल्पी , वटवृक्ष ,मधेपुरा टाइम्स, नव्या ,लोकसत्य ,नयी गज़ल, ओबीओ पत्रिका, गर्भनाल और कादंबिनी, विभिन्न इ-मैगज़ीन आदि।

निम्न तीन ब्लोग हैं
1) ज़िन्दगी ………एक खामोश सफ़र (http://vandana-zindagi.blogspot.com)
2) ज़ख्म …………जो फ़ूलों ने दिये  (http://redrose-vandana.blogspot.com)
                3) एक प्रयास (http://ekprayas-vandana.blogspot.com)


सोमवार, 17 सितंबर 2012

परिचय-ऋता शेखर मधु



मेरा परिचय

रश्मिप्रभा दी ने कहा- अपना परिचय भेजो

पर क्या लिखूँ...मुझमें कुछ भी खास नहीं

रश्मि दी ने कहा-

तुम संवेदनशील हो, यह परिचय खास है

अब कुछ न कुछ तो लिखना ही था

एक कोशिश अपना परिचय देने की...

कौन हूँ मैं

ब्रह्म मुहुर्त में

कौंधा एक सवाल

कौन हूँ मैं ?

क्या परिचय है मेरा ?

सिर्फ एक नाम

या और भी बहुत-कुछ

वह, जो अतीत में थी

या जो अभी हूँ

या जो भविष्य में होऊँगी

यादों के झरोखों से

झाँककर जो देखा

एक खिलखिलाती चुलबुली

नन्ही सी लड़की

अपने भाई-बहन के साथ

बागों में तितलियों के पीछे भागती

दादा-दादी की लाडली

चाचा-बूआ की प्यारी

मम्मी-पापा की आँखों का तारा

विद्यालय में

शिक्षकों के लिए

एक होनहार विद्यार्थी,

इस तरह से बचपन जीती हुई

कब और क्यूँ

विदाई की बातें होने लगीं

इनका जवाब तलाशती

लाल जोड़े में

ससुराल की देहरी के अन्दर

मेरे किरदार बदल गए

बहू, पत्नी,

दो प्यारे-प्यारे बच्चों की माँ

मेरे अपने पल

कब इनके हो गए

पता ही नहीं चला

मन की इच्छाएँ

कर्तव्यों के ताले में

बन्द हो गए

समय बीता

धीरे-धीरे मेरे पल

मुझे वापस मिलने लगे

फुरसत में देखा

तहायी हुई इच्छाएँ वहीं पड़ी थीं

कुछ लिखने की इच्छा

अपने विचार शेयर करने की इच्छा

फिर देर नहीं किया

माँ सरस्वती की कृपा से

अपनी लेखनी के साथ

मैं, ऋता शेखर मधु

आपके सामने हूँ

जब कलम उठाया तो

सबसे पहले जो लिखा

मेरा उद्गार

जीवन की आपाधापी में

जीवन के संघर्ष में

रिश्तों के तानोंबानों में

ऐसी उलझी मैं,

फुर्सत न मिली सोचने की

हूँ मैं भी एक मैं|

कुछ पल मिले बैठने को

लगा कहाँ हूँ मैं

दुनिया की इस भीड़ में

कहीं तो हूँ मैं

मन में था विचारों का रेला

बहने को बेताब हुआ|

लेखनी आ गई हाथों में

कागज़ से उसका मिलाप हुआ|

उभर आए अक्षर के मोती

पिरोने का संतोष हआ|

पसन्द आए अगर ये माला

समझूँगी जीवन धन्य हुआ|

*---*---*---*---*---*---*---*

इसके बाद कुछ कविताएँ लिखीं| कुछ सार्थक लिख भी पा रही हूँ या नहीं, विश्वास डावाँडोल हो गया| छोटे भाई के समान एक करीबी लेखक एवं पत्रकार मित्र को कविताएँ पढ़ने के लिए भेजा| मेरी कविताओं के लिए जो कुछ भी उन्होंने लिखा वह उत्साहित कर गई मुझे| आप भी पढ़िए---

कविताएँ आपकी

उतर जाती हैं

मन की गहराइयों में

कविताएँ आपकी|

शब्दों में अर्थ है

पंक्तियों में भाव

रस हैं, छंद हैं

लय ही स्वभाव|

अलंकृत हो मचलती हैं

कविताएँ आपकी||

यथार्थ के धरातल की

आवरण बनी कल्पना

जीवन की कड़वाहट में

होता सच है सपना|

सपनों में इतराती हैं

कविताएँ आपकी||

हर्ष बनी कविता

विषाद बनी कविता

रच-बस मन में

स्वभाव बनी कविता|

हंस कर हंसाती हैं

कविताएँ आपकी||

गाती हैं, गुनगुनाती हैं

बिन कहे कह जाती हैं

खुश्बू बन फूलों में

उतर-बस जाती हैं|

कली-कचनार हैं

कविताएँ आपकी||

नदियों में नीर बन

करती हैं कलरव

नाविक का नाव बन

मचाती हैं हलचल|

लहरों पर इठलाती हैं

कविताएँ आपकी||

कविता है ऋता की

ऋता बनी कविता

ओर है, अंत भी

अनन्त है कविता|

आंगन की तुलसी हैं

कविताएँ आपकी||

भाव करे मह-मह

छंद करे कलरव

रस की सरिता में

अलंकार हैं अभिनव|

जीवन श्रृंगार की

कविताएँ आपकी||

ऋता शेखर 'मधु' को ससम्मान-

डॉ लक्ष्मीकांत सजल

शिक्षा प्रतिनिधि

हिन्दी दैनिक आज

पोती, बेटी, बहन, भतीजी, बहू, पत्नी, माँ, मासी, बूआ, मामी, चाची,सहेली का किरदार निभाने के बाद भविष्य में कुछ नए किरदार निभाने हैं...सासू माँ, नानी, दादीः)

और वानप्रस्थ तक पहुँची तो मोक्ष की ओर टकटकी लगाए एक अशक्त वृद्धा का किरदार!!

सर्टिफिकेट के अनुसार मेरा परिचय---

नाम रीता प्रसाद उर्फ ऋता शेखर मधु

जन्म ३ जुलाई, पटना में

शिक्षा एम. एस. सी.( वनस्पति शास्त्र), बी. एड.

पटना विश्वविद्यालय से

संप्रति शिक्षिका

पापा का नाम- स्व० चन्द्रिका प्रसाद, सचिवालय में कार्यरत थे|

सरलता, निश्छलता, निष्कपटता उनके इन गुणों को अनजाने ही हम भाई-बहनों ने आत्मसात् कर लिया था|

माँ का नाम श्रीमती रंजना प्रसाद, सरकारी हाई स्कूल में वरीय शिक्षिका थीं|

कर्मठता और सहनशीलता उनसे सीखा|

विधाएँ, जिनमें मैं लिखती हूँ कविता, लघुकथा, कहानी, आलेख, बाल कविता, छंद

जापानी छंद-हाइकु, ताँका, चोका, माहिया

हिन्दी छंद चौपाई, दोहा, कुण्डलिया, हरिगीतिका, अनुष्टुप, घनाक्षरी, रोला

ग़ज़ल भी लिखने की कोशिश करती हूँ|

मेरे दो ब्लॉग्स जून २०११ को मेरे सुपुत्र ने ब्लॉग बनाया| तब से नियमित रूप से रचनाएँ प्रकाशित करने की कोशिश करती हूँ|

१) मधुर गुंजन http://madhurgunjan.blogspot.in/

२) हिन्दी हाइगा http://hindihaiga.blogspot.in/



मेरा शौक -
चित्रकारी

प्रिंट प्रकाशन

भाव-कलश २९ कवियों का ताँका संग्रह, सम्पादकद्वय - रामेश्वर काम्बोज हिमांशुजी

एवं डॉ भावना कुँअर जी

खामोश, खामोशी और हम रश्मिप्रभा जी द्वारा संपादित साझा काव्य-संग्रह

शब्दों के अरण्य में - रश्मिप्रभा जी द्वारा संपादित साझा काव्य-संग्रह

उदंती मासिक पत्रिका में मेरी कविता(मई)

संचयन २०११ के १०० लघुकथाकारों में मेरी भी तीन रचनाएँ ,

सम्पादक डॉ कमल चोपड़ा जी

समीक्षा दिलबाग विर्क जी के हाइकु-संग्रह माला के मोती में मेरी समीक्षा

कुछ और भी

खुद को शांतचित पाती हूँ तब

जब सर पर पल्लू लिए

हाथों में अर्ध्य का जल ले

तुलसी-चौरा की परिक्रमा करती

सबकी भलाई के लिए प्रार्थना करती हूँ|

दूसरी संतुष्टि

ऋता मैडम बनी

अपने विद्यालय में

बच्चों के साथ

अपना बचपन जीती हूँ|

तीसरी संतुष्टि ब्लॉग पर

अपनी लिखती

सबकी पढ़ती

नई-नई बातें सीखती हूँ|

झूठ से सख़्त नफ़रत करती हूँ|

कुछ ऐसा लिखना चाहती हूँ जो

समाज और देश के हित में हो|